Wednesday, August 28, 2019

हक़ की नींव रखने वाले बीपी मण्डल अमर रहें, 101 वीं जयंती पर उनको शत-शत नमन, वंदन।

हक़ की नींव रखने वाले बीपी मण्डल अमर रहें,
101 वीं जयंती पर उनको शत-शत नमन, वंदन।
बीपी मंडल अर्थात बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री, संसद सदस्य और पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष। मोरारजी देसाई सरकार में 20 दिसम्बर 1978 को आयोग के अध्यक्ष बने और 2 साल तक गांव- गांव घूमकर रिपोर्ट तैयार की। इतना कठिन कार्य उन्होंने अपने बलबूते पर किया और 1980 में संसद रिपोर्ट रखी, जिसमें बताया कि 3,743 पिछड़ी जातियां हैं। जिनकी सामाजिक, आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। इन जातियों को मुख्यधारा में शामिल किये बिना देश का विकास सम्भव नहीं है। उन्होंने उन्होंने ओबीसी जातियों के विकास के लिए 40 सिफारिशों को लागू करने की बात कही। बीपी मण्डल ने जातिगत भेदभाव शुरू से देखा था। जब वे पढ़ने के दौरान हॉस्टल में रहते थे तो वहां पर पहले अगड़ी जातियों को खाना दिया जाता था और बाद में अन्य जातियों को। यहां तक कि स्कूल की टेबल पर अगड़ी जातियों को बैठाया जाता था। शेष को नीचे। इस अन्याय को भी उन्होंने स्कूल के दिनों में उठाया और वहां पर उन्होंने समानता का व्यवहार करवाया। मण्डल जिंदगी से जूझने वाले नेता थे। हालांकि 13 अप्रैल 1982 को इस जमीनी नेता की मौत हो गयी।
7 अगस्त 1990 को बीपी सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा कर दी। इससे नाराज होकर उप प्रधानमंत्री देवीलाल ने इस्तीफा दे दिया और देश में अगड़ी जातियों विरोध करना शुरू कर दिया। दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक छात्र ने आत्मदाह कर लिया। इस विरोध को कई राजनेता, कई संगठन सुनियोजित तरीके से हवा दे रहे रहे थे, क्योंकि कोई भी न तो हक़ देना चाहते थे और न ही इस पर बात करना चाहते थे। षड्यंत्र के तहत मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया। 9 न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वे करवाया और पिछड़ी जातियों को अति पिछड़ा माना। सामाजिक, आर्थिक स्थिति दयनीय मानी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 16 नवंबर 1992 में अपने फैसले में मंडल आयोग की सिफारिशों को सही माना और कुछ सिफारिशों को लागू करने की बात कही। 8 सितंबर 1993 से ओबीसी वर्ग के लोगों को 27% आरक्षण देना शुरू हुआ। 20 फरवरी 1994 को वी राजशेखर ओबीसी आरक्षण के अंतर्गत नौकरी पाने वाले पहले अभ्यर्थी बने। 
लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि आज तक मण्डल की 40 सिफारिशों में से अधिकांश को माना ही नहीं गया। क्योंकि ओबीसी जातियां सोयी हुईं थी और धर्म के अंधविश्वास में लिपटी हुईं थीं। वो अपने हक के लिये संघर्ष नहीं कर सकीं। यहां तक कि इसका खामियाजा वीपी सिंह सरकार को भी उठाना पड़ा और बीजेपी ने सहयोग वापस लेते ही सरकार गिर गयी।
मंडल ने देश में जातियों की गणना तो की थी, लेकिन जनसंख्या की गणना नहीं हुई और आसान भी नहीं था। हैरानी की बात तो यह है कि 1931 से ओबीसी की जनगणना ठीक से ही नहीं की गयी। 1991, 2001 और 2011 में भी जनगणना की गई, लेकिन उसके आंकड़े नहीं बताये गये। न ही यह बताया गया कि कितनी जनसंख्या है और कितने लोग किस-किस प्रकार की नौकरियों में हैं। जो थोड़ी बहुत सच्चाई बाहर आयी है उसके अनुसार वर्तमान की स्थिति यह है कि प्रथम क्लास की नौकरियों में मात्र 2 से 2.5% और सेकंड, थर्ड और फोर्थ क्लास की नौकरियों में 4 से 5 % ही लोग हैं। दूसरों का हक खाने के लिए वह इस कटु सत्य को छुपाए रखना चाहते हैं। सरकारें 55% से अधिक इस आबादी का वोट पाकर सत्ता तो चाहतीं हैं, लेकिन हक़ देना नहीं चाहतीं हैं। यह आबादी जब तक मूर्ख बनीं रहें बनाए रखना चाहती हैं। आज भी जनसंख्या के सापेक्ष जो 27% आधा मिल रहा है, उसको भी सरकारों और सुप्रीम कोर्ट कोर्ट ने मिलकर खत्म कर दिया है।
हमारा मानना है की जब तक सभी वर्गों का विकास नहीं होगा, मुख्यधारा में नहीं लाया जाएगा। तब तक देश का विकास नहीं हो सकता।
जो लोग आरक्षण का विरोध करते हैं या आरक्षण खोर कहते हैं और इस पर बहस करना चाहते हैं तो उनसे कहना चाहता हूं कि सबसे पहले sc, st, ओबीसी की जनसंख्या के आंकड़े बताइए। नौकरियों में जितने हम हैं, उसके आंकड़े बताइए और जो बैकलॉग हैं उसके पदों को भरिए। जनसंख्या के सापेक्ष आरक्षण दीजिए जो जितना है उसको लीजिए। यदि यह नहीं करते हैं तो अपना तो विकास कर सकते हो, लेकिन संपूर्ण देश का विकास नहीं हो सकता और जब तक संपूर्ण देश का विकास नहीं होगा हम विकसित नहीं हो सकते।
आज तक जितना आरक्षण मिला उस परसेंट के सापेक्ष हम क्यों नहीं आ पाये। क्यों पिछड़ गए? कारण यह था कि एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत आरक्षण मिलने के बाद भी बहुसंख्यक समाज को रोका गया। क्योंकि व्यवस्था में जो लोग थे वह ऐसा नहीं चाहते थे।
यह भेदभाव कब तक?
बीपी मण्डल जी का जन्म 25 अगस्त 1918 बनारस, अवसान 13 अप्रैल 1982 पटना।
उनको नमन, वंदन।

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